
लखनऊ: हर साल 19 अप्रैल को मनाया जाने वाला वर्ल्ड लिवर डे हमारे शरीर के सबसे मेहनती, लेकिन अक्सर नजरअंदाज किए जाने वाले अंग—लिवर—पर जरूरी ध्यान केंद्रित करता है। साल 2026 की थीम “Solid Habits, Strong Liver” एक सकारात्मक बदलाव की ओर इशारा करती है। यह जटिल मेडिकल टर्म्स या डरावनी चेतावनियों की बजाय एक आसान और सच्चाई भरी बात पर जोर देती है—हमारी रोजमर्रा की आदतें। असल में, लिवर की सेहत की लड़ाई यहीं से शुरू होती है।
लिवर बिना ज्यादा शोर किए लगातार काम करता रहता है। यह दिल या फेफड़ों की तरह शुरुआती चेतावनी संकेत नहीं देता। यह चुपचाप खून को फिल्टर करता है, पोषक तत्वों को प्रोसेस करता है, टॉक्सिन्स को तोड़ता है, ऊर्जा को स्टोर करता है और शरीर के केमिकल बैलेंस को बनाए रखता है। कई बार हम सालों तक इसे उसकी क्षमता से ज्यादा काम करवाते रहते हैं और फिर भी खुद को “ठीक” महसूस करते हैं—जब तक कि अचानक स्थिति बिगड़ न जाए।
मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, साकेत के लिवर एंड बिलियरी साइंसेज विभाग के कंसल्टेंट डॉ. विपुल गौतम ने बताया “भारत में मेटाबॉलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टिएटोटिक लिवर डिजीज के मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है, जिसका मुख्य कारण खराब खानपान, कम शारीरिक गतिविधि, मोटापा और डायबिटीज हैं। अच्छी बात यह है कि यह बीमारी शुरुआती चरण में काफी हद तक रोकी और उलटी की जा सकती है। संतुलित आहार, नियमित फिजिकल एक्टिविटी, वजन को नियंत्रित रखना और मेटाबॉलिक रिस्क फैक्टर्स को मैनेज करना—ये सभी इसकी रोकथाम और इलाज के आधार हैं। साथ ही, नियमित हेल्थ चेकअप भी बेहद जरूरी हैं ताकि शुरुआती और हल्के लिवर बदलावों को समय रहते पहचाना जा सके। लिवर फंक्शन टेस्ट, अल्ट्रासाउंड और मेटाबॉलिक स्क्रीनिंग जैसे सरल टेस्ट, खासकर हाई-रिस्क लोगों में, समय रहते समस्या का पता लगाने में मदद करते हैं।“
अल्कोहल एक अहम लेकिन अक्सर गलत समझा जाने वाला कारण है। जिन लोगों में पहले से जोखिम मौजूद है, उनके लिए कम मात्रा में शराब का सेवन भी लिवर को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए शराब को सीमित करना या पूरी तरह से छोड़ना सबसे प्रभावी बचाव उपायों में से एक है। इसके साथ ही वायरल हेपेटाइटिस (A और B) के खिलाफ वैक्सीनेशन को बढ़ावा देना चाहिए, क्योंकि यह लिवर की गंभीर बीमारियों से लंबे समय तक सुरक्षा देता है। हालांकि हेपेटाइटिस C के लिए कोई वैक्सीन नहीं है, लेकिन समय पर जांच और इलाज से गंभीर जटिलताओं को रोका जा सकता है।
डॉ. विपुल ने आगे बताया “अक्सर लोग आसान और नियमित आदतों की अहमियत को नजरअंदाज कर देते हैं और इसके बजाय फैंसी डाइट, डिटॉक्स प्रोग्राम या चमत्कारी सप्लीमेंट्स की ओर भागते हैं। जबकि लिवर को किसी ड्रामेटिक बदलाव की नहीं, बल्कि अनुशासन की जरूरत होती है। घर का बना खाना चुनना, मीठे पेयों की जगह ब्लैक कॉफी लेना, छोटी दूरी के लिए गाड़ी की बजाय पैदल चलना, शराब का सेवन सीमित रखना और साल में एक बार बेसिक हेल्थ चेकअप करवाना—ये सभी साधारण लगने वाली आदतें लंबे समय में लिवर की सेहत पर गहरा असर डालती हैं।“
हमारा लिवर बेहद मजबूत होता है—यह खुद को ठीक कर सकता है, दोबारा बन सकता है और परिस्थितियों के अनुसार ढल सकता है, लेकिन खराब आदतों का बोझ यह हमेशा नहीं उठा सकता। “Solid Habits, Strong Liver” का मतलब परफेक्ट होना नहीं, बल्कि लगातार सही विकल्प चुनना है। क्योंकि लिवर की सेहत के मामले में, आप रोज क्या करते हैं, वही सबसे ज्यादा मायने रखता है—कभी-कभार किए गए प्रयास नहीं।
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